
।। डिग्री एक, दुकानें अनेक: सिद्धार्थनगर में स्वास्थ्य विभाग का ‘मल्टी-लेवल’ भ्रष्टाचार!
।। मौत का 'लाइसेंस' बांट रहा विभाग? एक डॉक्टर के नाम पर 5 अस्पतालों का मायाजाल।।
अजीत मिश्रा (खोजी)
स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे ‘डिग्री’ का व्यापार: मरीज़ों की जान या कागज़ी खेल?
शुक्रवार 16 जनवरी 26, उत्तर प्रदेश।
सिद्धार्थनगर से आई ताज़ा रिपोर्ट ने जिले के स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली की बखिया उधेड़ कर रख दी है। एक डॉक्टर, पाँच अस्पताल और दर्जनों पैथोलॉजी सेंटर! यह गणित किसी चमत्कार से कम नहीं है, लेकिन इस ‘चमत्कार’ के पीछे भ्रष्टाचार का वह काला खेल है जिसमें डॉक्टर की डिग्री को मुनाफे की मशीन बना दिया गया है।
⭐कागज़ों पर डॉक्टर, ज़मीन पर यमराज!
हैरानी की बात यह है कि ये संस्थान कागज़ों पर डॉक्टर की ‘पूर्णकालिक उपस्थिति’ का दावा करते हैं। क्या प्रशासन यह बताएगा कि कोई इंसान एक ही समय में पाँच अलग-अलग जगहों पर कैसे मौजूद रह सकता है? सच तो यह है कि इन अस्पतालों को अप्रशिक्षित और अयोग्य लोग चला रहे हैं, जबकि डॉक्टर का नाम सिर्फ ‘लाइसेंस’ की ढाल के रूप में इस्तेमाल हो रहा है।
⭐विभाग की चुप्पी: सहमति या लाचारी?
मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) का यह कहना कि ‘जांच के बाद कार्रवाई होगी’, एक रटा-रटाया सरकारी जुमला लगता है। सवाल यह है कि जब ये सेंटर वर्षों से फल-फूल रहे थे, तब विभाग की आँखें क्यों बंद थीं? आरटीआई कार्यकर्ताओं द्वारा नामजद शिकायत किए जाने के बावजूद, ठोस कार्रवाई के बजाय फाइलों का इधर-उधर घूमना विभाग की संलिप्तता पर गहरा संदेह पैदा करता है।
“पिछले तीन वर्षों में निजी अस्पतालों की लापरवाही से 12 से अधिक मौतें हो चुकी हैं। क्या विभाग इन मौतों को केवल एक ‘आंकड़ा’ मानता है या फिर किसी बड़ी अनहोनी का इंतज़ार कर रहा है?”
⭐जवाबदेही किसकी?
पंजीकरण का खेल: कैसे एक ही डॉक्टर के नाम पर एक से अधिक एनओसी (NOC) जारी हो गईं?
नकली इलाज: जब डॉक्टर मौके पर मौजूद नहीं होता, तो मरीजों के ऑपरेशन और गंभीर उपचार कौन कर रहा है? क्या यह सीधे तौर पर हत्या का प्रयास नहीं है?
प्रशासनिक संरक्षण: क्या इन अवैध सेंटरों को राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है?
⭐अब सख्त प्रहार की ज़रूरत है
यह मामला सिर्फ चंद अस्पतालों को सील करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन डॉक्टरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होनी चाहिए जिन्होंने अपनी डिग्री को ‘किराए’ पर दिया है और उन अधिकारियों पर भी गाज गिरनी चाहिए जिन्होंने अपनी नाक के नीचे इस गोरखधंधे को पनपने दिया।



















